Category: शिशु रोग

बच्चों को बुखार व तेज दर्द होने पे क्या करें?

By: Salan Khalkho | 1 min read

अगर आप के बच्चे को बुखार है और बुखार में तेज़ दर्द भी हो रहा है तो तुरंत अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाएँ। बुखार में तेज़ दर्द में अगर समय रहते सही इलाज होने पे बच्चा पूरी तरह ठीक हो सकता है। मगर सही इलाज के आभाव में बच्चे की हड्डियां तक विकृत हो सकती हैं।

बच्चों को बुखार व तेज दर्द होने पे क्या करें

ठण्ड के मौसम में सर्दी के साथ साथ अगर बच्चे को तेज़ बुखार भी है और किसी विशष अंग में तेज़ दर्द, सूजन और साथ ही शरीर का वो हिस्सा लाल हो गया हो तो बिना समय गवाएं तुरंत डॉक्टर से परामर्श करें। 

समय रहते बीमारी की सही पहचान हो जाने से दवाओं के द्वारा बच्चे को ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर ज्यादा देर तक इस बात की अनदेखी की गयी तो बच्चे को जिंदगी भर के लिए तकलीफ झेलनी पड़ सकती ही। 

इस प्रकार के बीमारी वाले लक्षण से बच्चे के शरीर में शारीरिक विकृति भी उत्पन हो सकती है। कई स्थितियों में यह शारीरक विकृति बच्चों में जिंदगी भर बनी रहती है। 

हालाँकि तेज़ बुखार और दर्द के द्वारा पैदा हुई विकृति को आधुनिक तकनिकी द्वारा ठीक किया जा सकता है, मगर पूरी तरह से रिकवर हो पाना - ये बहुत सी बातों पे निर्भर  करता है। 

इस प्रकार से पैदा हुई विकृति को ठीक करने की advance तकनिकी विकसित की जा चुकी है। अभी कुछ ही दिनों पहले एक तेराह वर्षीया बालक के पैरों में इसी तरह की विकृति का इलाज करने के लिए SMS  में इसका पहली बार इस्तेमाल हुआ। 

इलाज के दरमियान इस तेराह वर्षीया बालक को विशेष तरह का एसयूवी फ्रेम पहनाया जाता है। इस फ्रेम की खासियत यह है की इसमें छह डिस्टे्रक्टर (रॉड) लगे हैं जो हड्डी का आकर बढ़ाने-घटाने में सहायता करते हैं। 

इस फ्रेम को शरीर के प्रभावित हिस्से में पहना कर मरीज की मौजूदा स्थिति की पूरी जाँच की जाती है। हर जानकारी को रिकॉर्ड किया जाता है जैसे की अंग कितना बड़ा या छोटा है या फिर कितना टेढ़ा है। यह सारी जानकारी कंप्यूटर में मौजूद सॉफ्टवेयर में फीड किया जाता है 

इस तकनिकी के दुवारा इस प्रकार के शारीरिक विकृति को ठीक करने में करीब तीन महीने का समय लग जाता है। इस तकनिकी में मरीज की हड्डियोँ को बढ़ाया, घटाया या मजबूत किया जाता है। 

मरीज का इलाज कर रहे विशेषज्ञ  इस बात का निर्धारण करते हैं की डिस्टे्रक्टर की सहायता से मरीज का कितना आकार बढ़ाना-घटाना, या फिर डिस्टे्रक्टर को कब और कितना बड़ा-छोटा करना है। 

विशेषज्ञ दुवारा यह सारी जानकारी कंप्यूटर में फीड कर दी जाती है। इन सभी जानकारी के आधार पे मरीज को को एक विस्तृत ब्योरा प्रिंटआउट के रूप में दिया जाता है। 

पुरे इलाज के दौरान मरीज को कोई तकलीफ न हो इसका पूरा इंतेज़ाम किया जाता है। विशेषज्ञ निर्धारित समय-समय पे मरीज को फॉलोअप के लिए बुलाते हैं। 

एक बार इस तकनीक दुवारा मरीज पूरी तरह ठीक हो जाने पे वो एक सामान्य जीवन जीने में सक्षम हो जाता है। 

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